कला के प्रति समर्पित कलाकार – स्व. पृथ्वीराज कपूर

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मायापुरी अंक, 55, 1975

जमाना चाहे कितनी ही तरक्की कर जाए किंतु आदमी जब कभी अतीत के झरोखे में झांकता है तो उसे अतीत से एक तरह की प्रेरणा मिलती है। उसे लगता है कि आज से तो कल ही अच्छा था। लेकिन ऐसे लोग भी चाहिये जो कि दिलों पर ऐसा असर डाल सके। आज देश में फैली आपाधापी पर नज़र डालने पर स्व. पृथ्वीराज कपूर की महानता पर ईमान ले आने को दिल करता है। आज कौन इस कदर निस्वार्थ है जितने कि पापा जी थे उन्होंने अपने आपको देश और राष्ट्र को समर्पित कर दिया था। वे राष्ट्र के गम में खुद रोया करते थे और देश की खुशी के अवसर पर सबको हंसाया करते थे। बात उन दिनों की है जब देश के एक महान नेता रफी अहमद किदवाई का देहांत हो गया था (वे पहले नेता थे जो अपने पीछे दुनिया का कर्ज छोड़ गए थे जबकि लोग बैंक बैलेंस छोड़ते है) ऐसे समर्पित नेता की याद कायम करने के लिए पापाजी ने देश के हर बड़े शहर में स्टेज पर ड्रामे किये और चंदा इकट्टा किया था। मुझे अलीगढ़ के बुजुर्ग ने बताया था कि वे चंदा इकट्टा करने अलीगढ़ भी गये थे। वहां उन्होंने तस्वीर महल में अपना ड्रामा पठान स्टेज किया था। वे ड्रामे के हर शो के बाद ऐलान करते रफी अहमद किदवाई मेमोरियल फंड में दिल खोलकर चंदा दीजिए। और फिर मुंह पर एक रूमाल डाल कर (ताकि चंदा देने वाला नज़र न आए) कपड़े की झोली फैलाकर थियेटर के बाहर आकर खड़े हो जाते और सबसे चंदा लेते। उन बुजुर्ग साहब ने बताया था कि मैने खुद कई औरतों को उस फंड के लिए हीरे की अंगुठियां और जेवर पृथ्वीराज कपूर की झोली में डालते देखा था।

अब ऐसे समर्पित कलाकार कहां रह गये है?  हां, ऐसी ही एक कलानेत्री मीना कुमारी भी थी।

बात उस वक्त की है, जब रंजीत फिल्म कम्पनी बंद नही हुई थी। लेखक निर्देशक जिया सरहदी उस कंपनी के लिए फिल्म ‘फुटपाथ’ बना रहे थे। रंजीत स्टूडियो में ही फिल्म की शूटिंग हो रही थी। उस दिन स्टूडियो तो खुल गया था किंतु कामगार गायब थे। क्योंकि वह दिन कामगारों की छुट्टी का दिन था। स्टूडियो का फर्श इतना गंदा पड़ा था कि उस पर शूटिंग नहीं हो सकती थी। निर्देशक जिया सरहदी ने अपने हाथ में झाडू उठाई और फर्श साफ करने खड़े हो गए। फिल्म की हीरोइन मीना कुमारी ने जब यह देखा कि निर्देशक फर्श साफ कर रहा है तो उन्होंने भी हाथ में झाड़ू उठा ली और फर्श की सफाई शुरू कर दी। मीना कुमारी को झाड़ू लगाता देखकर रमेश थापर (जिन्होंने फुटपाथ में दिलीप कुमार के भाई की भूमिका की थी) ने फर्श साफ करना शुरू कर दिया (उस दिन दिलीप कुमार सेट पर न थे)

Meena kumari
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दूसरे दिन दिलीप कुमार नैनीताल में संगदिल की शूटिंग खत्म करके सेट पर हाज़िर हुए तो उन्हें यह किस्सा सुनाया गया। यह सुनकर दिलीप कुमार खूब हंसे और कहने लगे ऐसे मौके पर तो मुझे भी होना चाहिये था।

आज हालत यह है कि स्टार को अगर ज़रा-सा पानी मिलने में देर हो जाए लिबास की धुलाई या सफाई में कमी रह जाए तो उस दिन उनकी शूटिंग लेट हो जाती है और कभी-कभार तो कैंसल तक हो जाती है।

यहां मैं दिलीप कुमार के जिक्र के साथ राजकपूर का जिक्र करना इसलिए जरूरी समझता हूं कि दोनों हमारी इंडस्ट्री की नाक है। और दोनों साथ पढ़ लिख कर बड़े हुए है। इसलिए दोनों में दोस्ती बड़ी गहरी रही है। दिलीप कुमार के मुंबई टॉकीज में हीरो चुन लिए जाने से राजकपूर हीनभावना के शिकार हो गए थे। राजकपूर के पृथ्वी थियेटर से अभिनय सीखने के पश्चात केदार शर्मा ने नील कमल जागीरदार ने जेल यात्रा और महेश कौल ने गोपी नाथ में हीरो बना कर पेश किया किंतु इन फिल्मों से राजकपूर की एकदम से कोई बड़ी सफलता नही मिली इसलिए राजकपूर ने सोचा कि कामयाबी जभी मिलेगी जब मैं खुद अपनी फिल्म बनाऊं और इस तरह आर.के. फिल्म्ज की स्थापना हुई। और आग का निर्माण हुआ उसके बाद वह एक दिन के. एन. सिह के पास जा पहुंचे और बोले।

अंकल, मैं अपनी अगली फिल्म में आप को डायरेक्ट करूंगा।

यह सुन कर पृथ्वी राज जी के साथी और पड़ोसी के.एन. सिंह का सीना चौड़ा हो गया। उनकी गोद में खेला लड़का सामने खड़े हो कर यह बात कह रहा था। वही जिसने उनके सोफे गंदे किये थे यह सुन कर पृथ्वी राज जी के साथी और पड़ोसी के. एन. सिंह का सीना चौड़ा हो गया उनकी गोद में खेला लड़का सामने खड़े हो कर यह बात कह रहा था। वही जिसने उनके सोफे गंदे किये थे। फर्नीचर तोड़ा था। पर्दे फाड़े थे। वही राज अब उनसे काम करवायेगा। और जब उन्हें यह पता चला कि राज के सामने उन्हें खलनायक का रोल करना है तो उन्हें बड़ा विचित्र प्रतीत हुआ। लेकिन पृथ्वी राज जी ने उन्हे समझाया कि एक्टिंग हमारा पेशा है। और इस नाते से हमें सब कुछ करना चाहिये उसके बाद बरसात की शूटिंग शुरू हुई। और चाचा भतीजे एक दूसरे के दुश्मन बन गए। एक दृश्य में के.एन सिंह राजकपूर को कंधे पर उठा कर घास-फूस के ढेर पर फेंकते है। वास्तविकता लाने के लिये राजकपूर ने उनसे कहा, लिहाज मत करना खूब जोर से फेंकना काफी घास पड़ी है।

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के.एन.सिंह ने एक आज्ञाकारी कलाकार की तरह वैसा ही किया। राजकपूर को इतने ज़ोर से फटखा कि वह लुटक कर दीवार से जा टकराये। और फिर काफी देर तक सिर पकड़े रह गए।

के.एन. सिंह ने राजकपूर को सहारा देकर उठाया कि कहीं भतीजा घायल न हो गया हो। तभी राजकपूर ने कहा फिक्र मत कीजिए सिंह साहब आपने बहुत बढ़िया शॉट दिया है। अगर इतना ही खौफनाक न होता तो वह बात न बनती जो इस सीन के लिये जरूरी था।

बरसात बन कर रिलीज हुई तो उसने धूम मचा दी। और राजकपूर एक ही फिल्म से शोहरत की ऊंची चोटी पर जा बैठे, तब लोगों को पता चला कि उनमें कितनी आग भरी हुई है।

 

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