एक आदर्श अभिनेत्री एक घरेलू औरत – नरगिस

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मायापुरी अंक 54,1975

नरगिस की उम्र तब दस या ग्यारह वर्ष की रही होगी जब उर्दू के प्रसिद्ध लेखक सआदत हसन मंटो उनके घर में आया-जाया करते थे। मंटो की आंखों ने मासूम नरगिस के बचपन को जवान होते हुए भी देखा।
और न जाने एक दिन मंटो को क्या सूझा, उन्होंने नरगिस की माता श्रीमती जद्दनबाई से कहा यह बच्ची बहुत प्यारी है। इसमें घर को संभालने की सारी सलाहियतें मौजूद है। यह जिस घर में जायेगी, उसे स्वर्ग बना देगी।
लेकिन मेरी नज़र में यह स्टेच्यू उसी दिन टूट गया था जिस दिन नरगिस महबूब स्टूडियो में फिल्म ‘मदर इंडिया’ की शूटिंग करते समय पांव फिसल जाने से आग में जल गई थी और सुनील दत्त ने जलती आग को लपटों के बीच से नरगिस को अपनी बांहो में उठा लिया था दरअसल यह आग शूटिंग के सेट से हो कर नरगिस और सुनील के दिलों तक पहुंच गई थी। और लोग कहते थे कि यह मोहब्बत की आग है।
और फिर बहुत शीघ्र ही नरगिस सुनील दत्त की उन बांहो में हमेशा के लिए बंध गई जिन्होंने नरगिस को आग की लपटों से बचाया था। वह नरगिस से नरगिस दत्त बन गई।
सबसे पहले मैंने नरगिस को फिल्म रात और दिन के सेट पर महबूब स्टूडियो में ही देखा था। संजय नरगिस का आठ वर्षीय बेटा उनके साथ ही सेट पर आया था। सेट एक मंदिर का था जिस पर जोरदार बारिश हो रही थी। साथ ही करंट के तारों को मिलाकर बिजली कड़कने के विशेष प्रभावशाली दृश्य लिए जा रहे थे। इस बारिश और कड़कती बिजली के बीच नरगिस को मंदिर के दरवाजे पर जा कर उसे खटखटाना था। तीन रिटेक के बाद नरगिस का पांव अचानाक दरवाजे पर जाकर फिसल गया वह गिर पड़ी और उनका फ्रॉक फट गया फटे हुए फ्रॉक से शरीर झांकने लगा था, नरगिस वही सेट पर एक दीवार से छिपकर खड़ी हो गई।

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ऑफिस ब्वाय ने उन्हें तौलिया ला कर दिया और तब वे दीवार से बाहर आई किसी तरह फ्रॉक को सिलवा लिया गया और तब वे फिर कैमरे के सामने आई। फ्रॉक फट जाने का कारण भी बड़ा दिलचस्प था। ‘रात और दिन’ दरअसल नरगिस जी के भाई अख्तर हुसैन बना रहे थे। किन्ही आर्थिक अथवा अन्य कारणों से यह फिल्म बीच में रुक गई। करीब छ: साल तक रूकी रही और जब दुबारा पूरी की जाने लगी तो नरगिस जी को फ्रॉक कंटीन्यूटी में थी एकदम कमज़ोर हो चुकी थी। इसलिए बार-बार बारिश में भीगने के कारण फ्रॉक गल कर फट गई। नरगिस पूरे दिन उस दिन स्टूडियो की बारिश में भीगती रही। यहां तक कि उन्हें सर्दी हो गई छींको पर छींके आने लगी सत्येन दा (बोस) ने उन्हें घर जाने को कहा फिल्म का निर्देशन वे कर रहे थे।
नही, आज सारा काम पूरा कर लीजिए कम से कम मेरी नही तो इस फ्रॉक का काम जरूर पूरा कर लीजिए। नही तो यह दुबारा नही चल पायेगी। अब न यह घुल सकती है, और न फिर दुबारा पहनी जा सकती है।
‘रात और दिन’ नरगिस जी की अंतिम फिल्म थी जिसमें उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का ‘उर्वशी’ पुरस्कार प्राप्त हुआ था। नरगिस ही शायद वह अभिनेत्री थी जो अपनी हर फिल्म में अभिनय के नये-नये स्तंभ स्थापित करती चली गई उनकी फिल्मों से उनकी इमेज अभिनेत्री के रूप में एक आदर्श औरत की बन गई थी।
लेकिन आज जब भी मैं नरगिस को देखता हूं मुझे लगता है यह वह औरत है जो फिल्म के पर्दे से निकल कर वास्तविक जिंदगी में एक आदर्श औरत बन गई है। फिल्म संसार में ऐसी मिसाल दूसरी कोई अभिनेत्री पेश नही कर सकी। यहां तक कि मीना कुमारी भी नही जिसे हिंदी फिल्मों की दूसरी आदर्श औरत माना गया। मीना कुमारी के साथ समस्या यह रही कि उनकी ‘आदर्श औरत’ सिर्फ फिल्म के पर्दे तक ही रह गई।
लेकिन नरगिस इस मामले में मीना कुमारी से भी आगे निकल गई। आज भी नरगिस के प्रशंसको का कहना है कि अभिनेत्री के रूप में नरगिस ने जो स्थान छोड़ा था वह आज भी खाली है।
जब भी मैं कभी कही नरगिस को देखता हूं मुझे मंटो की याद आती है और याद आते है मंटो के वे वाक्य जो उन्होंने नरगिस के लिए कहे थे।

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