“जिंदगी एक सफर है सुहाना यहां कल क्या हो किसने जाना” स्व.जय किशन

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shankar jaikishan
मायापुरी अंक 53,1975
जिंदगी एक सफर है सुहाना यहां कल क्या हो किसने जाना? ‘अंदाज’ का यह मार्मिक गीत जब कभी सुनायी पड़ता है तो आंखो के सामने उस गीत को जिंदगी के सुरों में बांधने वाले संगीत-निर्देशक स्व. जयकिशन का हंसता-मुस्कुराता व्यक्तित्व उभर उठता है। मृत्यु के कुछ ही दिनों पूर्व अनजाने में उन्होंने इस गीत को इस तरह सुरों में बांधा जैसे यह उनकी आत्मा का संगीत है।
इसी तरह न जाने कितने गीत हैं जो स्व. जयकिशन की समृतियों को सजल करते हैं और उस युग की याद दिलाते हैं जब फिल्म संगीत क्षेत्र में शंकर-जयकिशन की जोड़ी की दृंदभी बजती थी। जहां शंकर जयकिशन वहां संगीत की महफिल और जहां संगीत की महफिल वहां शंकर-जयकिशन की जोड़ी…
और कब..!
अब लगता है फिल्म संगीत के वाद्य रूठ गये हैं। स्वं. जयकिशन वाद्यों के मसीहा थे। वे दिन-रात उन्हीं में खोये रहते थे। दिन-रात कुछ न कुछ नये प्रयोग करते रहते थे भारतीय लोक-गीतों में प्रयुक्त वाद्यों के बारे में उन्होंने जितनी खोज की उतनी शायद ही और किसी संगीत-निर्देशक ने की हो। ‘आवारा’ में शंकर जयकिशन की जोड़ी ने एक सौ से अधिक वाद्यों का अनोखा उपयोग कर फिल्म संगीत को नया मोड़ दिया था जो आज भी अनेक संगीत-निर्देशकों के सामने साहसिक उदाहरण बना हुआ है।
सन 1968 में एक फिल्मी पत्रिका में संगीतकार जयकिशन द्वारा आरकेस्ट्रा का अभिनव प्रयोग के शीर्षक से एक समाचार छपा था। उसमें लिखा था कि संगीत-निर्देशक जयकिशन ने भारतीय संगीत को अंतर्राष्ट्रीय धरातल पर लोकप्रिय बनाने की दिशा में एक अभूतपूर्व रचनात्मक कदम रखा है। वे भारतीय राग-रागिनियों की विभिन्न संगीत रचनाओं के लिए पश्चिमी संगीत में प्रयुक्त होने वाले वाद्यों का उपयोग करेंगे। जयकिशन एक लंबे अर्से से किसी ऐसी विधि की खोज में जुटे हुए थे जिससे कि भारतीय संगीत अपनी विशिष्टता, मधुरता एवं सूक्ष्मता खोये बिना, पश्चिमी संगीत रसिकों के लिए बोधगम्य हो सके।
इसी संदर्भ में एक बार स्वयं जयकिशन ने बातचीत में कहा कि, हमने अपने यहां प्यानों, गिटार, वॉयलिन, मैण्डोलिन जैसे पश्चिमी वाद्यों का खूब प्रयोग किया है और तब भी हम पाते हैं कि हमारे संगीत की भारतीयता सुरक्षित है। इसी आधार पर मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचता हूं कि आरकेस्ट्रा का पूर्ण पश्चिमीकरण कर दिया जाये और तब भारतीय रागों को अलंकृत किया जाय तो संभवत: पश्चिमी लोक मानस उन्हें जल्दी और सहज ही समझ सकेगा…
दम भर जो उधर मुंह फेरे ओर चंदा, घर आया मेरा परदेसी, हम तुमसे मोहब्बत करके सनम.. ऐसे गीत थे जिन्होंने आम दर्शकों को प्लावित कर दिया था। लता मंगेशकर का कहना है कि शंकर जयकिशन के निर्देशन में उनका गाया यह गीत आ जाओ तड़पते हैं अरमां अब रात गुजरने वाली है उनकी जिंदगी के प्रिय गीतों का एक प्रिय गीत है और जब भी उन्हें अपनी मनपसंद गीतों की चर्चा करनी होती है तो यह गीत अनायास उनके होठों पर फड़क उठता है और उनकी आंखे अपने आप बंद हो जाती हैं।
शंकर जयकिशन की जोड़ी सूर्यरथ के घोड़ो की तरह जुड़ी हुई थी। वह दिन कितना शुभ रहा होगा जब वे दोनों अपनी अपनी मंजिल की खोज में भटकते हुए मिले और जब मिले तो इस अहसास से मिले जैसे उनका जन्म-जन्मांतरों का साथ संबंध है और वे दोनों जुड़वे भाई हैं।
शंकर जी हैदराबाद से मुंबई आये थे और जयकिशन बलसाड़ से मुंबई आये। शंकर मुंबई आने के पूर्व तबला वादक थे और जयकिशन.. जयकिशन तो जैसे संगीत की मिट्टी में ही पलकर बड़े हुए हो, ऐसा लगता था। खुद बहुत अच्छा गा लिया करते थे, खुद बहुत अच्छा बजा लिया करने थे, एक नहीं अनेक वाद्य खुद बैठे बैठे धुन तैयार कर लिया करते थे। शंकर हैदराबाद में अनेक नर्तकियों के साथ कार्य कर चुके थे। संगीत-महफिलों में उनका नाम था.. पर जयकिशन मन ही मन संगीत के साधक बने हुए थे।
मुंबई में आकर जयकिशन को काफी भटकना पड़ा। एक बार उन्होंने बीते दिनों की याद करते हुए मुझे कहा था मुंबई जैसी महानगरी में जब तक मुफलिस के मौलवी की तरह न रहे, कुछ काम बनता नहीं। मैंने खुद न जाने कितने दिन चने मूंगफली फांक कर फाका मस्ती की है। न जाने कितने दिन उसल-पाव(डबलरोटी और चना जो मुंबई के गरीबों का खाना है) पर गुजारे हैं। पर वे दिन भी क्या थे? केवल गुनगुना कर जिंदगी का गम अमृत बना दिया करते थे।
कई दिनों तक भटकने के बाद जयकिशन को नौकरी भी मिली तो लड़की की पेटियां बनाने वाले कारखाने में। जिंदगी की यह कैसी विडम्बना! पर यहां भी पेंटियों की आवाज के बीच भी वे संगीत ढूंढने लगे। हथोड़ों की चोट में भी उन्हें धमकता-धमकाता, घहराता-थिरकता संगीत नजर आया। यहां उन्होंने कारखाने की उस विचित्र एंव पसीने बहाने वाली जिंदगी के बीच भी कई धुनें बनाली। वे धुनें ऐसी थी जो बाद में बहुत काम आयी और उनके संगीत के साथ जैसे आम लोगों की जिंदगी की धुनें और धड़कन बन गयी।
जयकिशन को कारखाने से जब भी अवकाश मिलता प्रोड्यूसरों के पास जाते अपनी धुनें सुनाते और बड़े आत्मविश्वास से कहते, जरा आज़मा कर देखों, वे बड़े आत्मविश्वास के साथ किसी भी तरह की परीक्षा के लिए हर वक्त तैयार रहते थे और यही उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी खूबी थी जो बाद में उनके व्यक्तित्व में महक उठी थी।
उन्हीं दिनों की बात है….!
शंकर जी थियेटर्स से संबधित हो चुके थे। पर उन्हें बाहर कार्य करने की स्वतंत्रा थी। इसी स्वतंत्रा का लाभ उठाकर वे गुजराती के प्रसिद्ध नाटककार चन्द्रबदन भट्ट के यहां पहुंचे जिन्होंने फिल्म बनाने की घोषणा की थी। जिस दिन वे वहां पहुंचे उसी दिन सौभाग्य से जयकिशन भी पहुंच गये। वहीं दोनों की पहली मुलाकात हुई जो पहले दोस्ती में बदली, फिर भाईचारे में बदली.. और जिंदगी की यारी में बदली और आगे चलकर फिल्म संगीत क्षेत्र में शंकर-जयकिशन की अटूट जोड़ी बनी।
शंकर ने अपने प्रयासों से जयकिशन को अपने पास पृथ्वी थियेटर्स में ही 75 रूपये मासिक वेतन पर नियुक्त करवा दिया। वहीं दोनों साथ-साथ काम करने लगे और अवकाश पाते ही दोनों मिलकर संगीत रचना में जुट जाते।
शंकर जयकिशन की जोड़ी पृथ्वी थियेटर्स में कार्य करने वाले सभी लोगों के लिए आकर्षण का केन्द्र बन गयी थी उन दिनों राजकपूर भी वही काम करते थे। उन्होंने ध्यान से दोनों की संगति-साधना को देखा। वे मन ही मन उनसे प्रभावित हुए।
एक दिन बैठे ही बैठे जयकिशन ने अपनी बनायी हुई एक नयी धुन राजकपूर को सुनायी। वे इस धुन पर इतने प्रभावित हो गये कि उन्होंने फट से उनसे मिलाकर वायदा कर लिया कि वे जब कभी फिल्म बनायेंगे उन्हें जरूर संगीत-निर्देशन का अवसर देंगे!
और वह समय आया कि राजकपूर फिल्म बनाने की सोचने लगे। ऐसे वक्त अवसर लोग पुराने वायदे भूल जाते हैं। पर राजकपूर उस वायदे को नहीं भूले। उन्होंने शंकर जयकिशन को बुलाया और ‘बरसात’ के लिए के लिए धुनें बनाने के लिए निमंत्रण दिया…!
बस फिर क्या था… जयकिशन ने धुनों की बरसात कर दी। ‘बरसात’ के गीतों की रिकॉर्ड हुई तो सारी फिल्मी दुनिया में शंकर-जयकिशन और उनके गीतकार शैलेन्द्र और हसरत जयपुरी के नाम चमक उठे।
‘बरसात’ फिल्म प्रदर्शित होते ही फिल्म संगीत क्षेत्र में यह चौकड़ी ऐसी जमीं ऐसी जमीं कि लोग देखते रह गये। ‘बरसात’ के गीत ‘जिया बेकरार है’ छायी बहार है, हवा में उड़ता जाये मेरा लाल दुपट्टा मलमल का, छोड़ गये बालम मुझे आज अकेला छोड़ गये, बरसात में हम से मिले तुम सनम तुम से मिले पतली कमर है तिरछी नज़र है.. गली कूंचो में गूंजने लगे. इतना ही नहीं, आज भी जब ये गीत सुनायी पड़ते है तो दिल को छूते है और उन गीतों के साथ थकी हारी जिंदगी भी रोमांटिक मूड में डूब कर मुस्करा उठती है।
‘बरसात’ की तरह ‘नगीना’ के गीत भी घर-घर गूंज उठे। फिर आयी बादल और अमय चक्रवर्ती की प्रसिद्ध फिल्म ‘दाग’ जिसमें दिलीप कुमार और निम्मी की जोड़ी थी।
इन फिल्मों के गीत आम दर्शकों की धड़कन बन गये थे। इन गीतों से पर युवा युवातियों के दिल मचलने लगे थे। इन गीतों से इनकी प्रतिष्ठा काफी ऊंची चढ़ गयी थी कि उस पर राज कपूर की ‘अवारा’ ने तो फिर चार चांद लगा दिये। ‘अवारा’ के गीत
आवारा हूं या गर्दिश में हूं आसमान का तारा हूं.. धरती से उठ कर आकाश तक देश की सीमाओं से पार विदेशों में भी गूंज उठे। ‘आवारा’ में जयकिशन ने वाद्यों के प्रयोग में अपनी सारी प्रतिभा को कसौटी पर कस दिया था। स्वंय राजकपूर का कहना है कि उन दिनों जब मैं जयकिशन को देखता था तो कभी-कभी सिहर उठता था। इसी तरह धुन बनाने में नये-नये प्रयोग में वह डूबा रहा तो कहीं अपने आप से बेखबर न हो जाये। उसकी कल्पना, तल्लीनता और श्रम साधना से मैं खुद द्रवित हो उठा और फिर एक दिन जयकिशन के कंधो पर हाथ रख कर कुछ कहने जा रहा था कि मेरी आंखे सजल हो उठी। इतनी खुशी थी… इतनी खुशी थी कि कुछ बोल भी मेरे मुंह से नहीं निकल पाये।
जब तक जयकिशन जीवित रहे, राजकपूर के साथ शंकर जयकिशन की जोड़ी फलती-फूलती रही। राज कपूर की हर फिल्म जयकिशन चुनौती मानते थे। राजकपूर की ‘श्री 420’ और बूट पॉलिश की अपार सफलता के पीछे उसके संगीत का बहुत बड़ा और गहरा हाथ है। और उस संगीत रचना में भी जयकिशन का गहरा हाथ है।
राजकपूर के बारे में जयकिशन प्राय: कहा करते थे कि, सच तो यह है कि राजकपूर ने हमें बनाया और उनकी फिल्मों ने हमारे संगीत को तराशा कुछ भी हो राजकपूर के साथ शंकर जयकिशन की जोड़ी का तालमेल कुछ इस तरह बैठा जैसे वह भी कोई प्रभू की लीला हो।
जयकिशन जब तक जीवित रहे। तब तक धुनें बनाते रहे। पाश्चात्य संगीत को भी अपनी धुनों में ढाला तो नये अंदाज तो नये अंदाज के साथ वे हमेशा निर्माताओं से यही कहा करते थे कि फिल्में जनता की है। इसलिए संगीत भी जनता का होना चाहिए। इस विचार धारा। के बावजूद कथा कहानी के अनुसार जब भी अवसर मिलता वे शास्त्रीय संगीत का सहारा लिये बिना नही रहते। शिकस्त के गीत.. कारे बदरा तू न जा न जा सपनों की सुहानी दुनियां का आंखो में बसाना मुश्किल है अपने शास्त्रीय संगीत के कारण ही लोकप्रिय हुए थे बसंत बहार में उन्होंने शास्त्री संगीत को उसके सही अर्थ में इस तरह प्रतिष्ठित किया कि उनके आलोचक भी खामोश हो गये। इस फिल्म के गीत भव भंजना वन्दना सुन हमारी, दुनिया न भाये भोहे अब तो बुलाले चरणों में केतकी गुलाब जुही चम्पक जुही चम्पक बन फूले नैन मिले चैन कहा, आज भी शास्त्रीय संगीत की महफिलों में बड़े गर्व के साथ सुनाये जाते हैं। इसी तरह ‘राजहठ’ के ये गीत, मेरे सपनों में आना रे, सजना, आये बहार बनके लुभा के चले गये, नाचे अंग-अग तेरे बाजे रे मृदंग बाजे, यह वादा करो चांद के सामने कहां से मिलते मोती, आंसू है मेरी तकदीर संगीत की दृष्टि से आज भी उच्चकोटि के माने जाते हैं। और जब जिस देश में गंगा बहती है गीत गलियों में गूंजे तो संगीत प्रेमी शंकर जयकिशन की संगीत साधना की सफलता देखकर चकित रह गये। ओ वसंती पवन पागल यह गीत आज भी श्रोताओं के मन में सिहरन पैदा कर देता है।
जयकिशन समय के साथ बदलते रहे और निर्माताओं की मांग के अनुसार फिल्मों में नयी नयी धुनें देते रहें। जंगली में पहली बार उन्होंने पाश्चात्य शैली में थिरकता संगीत दिया जिसकी नकल अब जोरों से की जा रही है। चाहे मुझे जंगली कहे कहने दो जो अब कहता रहे, कश्मीर की कली हूं मैं मुझ से न रूठो बाबूजी अइ अय्या करूं मैं क्या.. इन गीतों के थिरकते मचलते संगीत ने भारतीय फिल्मों के संगीत को नयी दिशा देकर उसे कुछ विवादस्पद भी बना दिया..
स्व. जयकिशन की राजकपूर की फिल्मों को छोड़ कर अन्य उल्लेखनीय फिल्में हैं, ‘उजाला’ ‘सिंगापुर’ ‘ब्यॉयफ्रेंड’ ‘करोड़पति’ ‘आस का पंछी’ ‘बादशाह’ ‘पूनम’ ‘सीमा’ ‘पतिता’ ‘यहूदी’ ‘लव मैरिज’ ‘जंगली’ ‘हरियाली और रास्ता’ ‘अनाड़ी’ ‘एक फूल चार कांटे’ ‘दिल अपना और प्रीत परायी’ ‘ससुराल’ ’प्रोफेसर’ ’ब्रह्माचारी’ ’छोटी बहन’ ’तीसरी कसम’ ’अंदाज’ आदि। राजकपूर की वे सारी फिल्में जिनमें उन्होंने संगीत दिया है भारतीय फिल्मों के इतिहास में माइल स्टोन बन चुकी है जिसका बहुत कुछ श्रैय उनके संगीत को है।
सन 1956 में उन्हें फिल्म ‘चोरी चोरी’ पर सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक का फिल्म अवार्ड मिला। यह अवार्ड उन्हें ‘अनाड़ी’ ‘दिल अपना और प्रीत परायी’ ‘प्रोफेसर’ ‘शर्त’ ‘ब्रह्माचारी’ फिल्मों के लिए भी मिल चुका है। वे अब तक 125 से अधिक फिल्मों में संगीत दे चुके हैं।
जयकिशन अपने साथी शंकर से छोटे थे। पर ते बड़े खूबसूरत बांके और दिलदार। मुंबई के प्रसिद्ध गेलार्ड रेस्तरां में एक जमाना था जब उन्हीं का बोलबाला था। वे सबके आकर्षण के केन्द्र थे यहीं उनकी मुलाकात पल्लवी से हुई और प्रथम मुलाकात में ही वे दोनों एक दूसरे के हो गये।
जयकिशन को सन् 1969 में पद्म श्री से विभूषित किया गया। इतना ही नही, अनेक सार्वजनिक संगीत समारोहों में उनका अनेक बार स्वागत किया गया। उन्हें संगीत के साथ अभिनय का भी शौक रहा है फिल्म ‘श्री 420’ और मैं सुंदर हूं में उन्होंने छोटी-छोटी भूमिकाएं भी की थी।
आज हमारे बीच जयकिशन नहीं है। हमारे साथ उनकी मधुर यादें हैं जो हमारे साथ उनके संगीत के सथ समय समय पर महक उठती है। जब हम किसी फिल्म समारोह में उनके दो पुत्र और पुत्री को देखते हैं तो आंखे सजल हो उठती है। करूणा से विहल मन बार-बार सोचता है
काश! हमारे बीच जयकिशन होते।

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