INTERVIEW: एक सादगी पसंद हीरोइन का असाधारण इतिहास नूतन

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मायापुरी अंक, 58, 1975

एक अभिनेत्री की उम्र कम से कम पांच साल और अधिक से अधिक दस साल होती है। किंतु अकेली नूतन ही एक ऐसी अभिनेत्री हैं जिन्होंने पिछले वर्ष अपने फिल्मी जीवन के 25 वर्ष पूरे किये हैं। इसलिए वह अपने आप में एक इतिहास है और इस इतिहास को जानने के लिए मैंने जब नूतन को फोन किया तो उन्होंने रूपतारा स्टूडियो में बुला लिया। (जहां वह मंदिर-मस्जिद की शूटिंग कर रही थी)

सफेद साड़ी में नूतन आज भी उतनी ही साधारण और आकर्षक लग रही थी जितनी वह अपने हीरोइन काल में थी।

आप जैसी सुंदर और कुशल अभिनेत्री के जीवन में यह उथल-पुथल देख कर आश्चर्य होता है क्या आप ने अपने जीवन में इस डाउनफॉल की कभी कल्पना की थी ? मैंने इंटरव्यू शुरू करते हुए पहला प्रश्न किया।

यह डाउन फॉल नैचुरल है। लेकिन मेरे विचार से यह डाउन फॉल 25 वर्ष बाद आया है तो देर से आया है। क्योंकि हो न हो एक लम्बे समय तक देखते-देखते लोग ऊब जाते हैं। फिर वह कुछ परिवर्तन चाहने लगते हैं। दरअसल हर उन्नति के पश्चात अवनति इंसान का मुकद्दर है। मुझे जीवन में इतना संतोष मिला है कि अगर कोई मुझे इस हालत से न उबारता तो मुझे कोई दुख न होता क्योंकि मैं डाउन-फॉल उसे समझती हूं जब लोग किसी कलाकार को स्वीकारने से इंकार कर देते हैं और उसके आने पर टमाटर या गंदे शब्दों से उसका स्वागत करते हैं।

मेरे साथ ऐसा नही हुआ है मुझे आज भी अपने प्रशंसकों का प्यार हासिल है दरअसल कलाकार कभी नही मरता। लेकिन उसके जीवन में ऐसे उतार चढ़ाव आते ही रहते हैं सुजाता और बंदिनी के समय जो इमेज और मार्केट थी वह आज नही है। यह एक कड़वा सच है और ऐसा हर कलाकार के साथ होता है और होता आया है फर्क यह है कि कुछ लोग हालात का रोकर मुकाबला करते हैं और मैंने हंसकर मुकाबला किया है। नूतन ने बिना झिझक सत्य उजागर करते हुए कहा।

आज वक्त के साथ कैसे रोल करना पसंद करती हैं ? मैंने पूछा।

मैं आज भी हर प्रकार के रोल करना चाहती हूं। एक ही तरह की भूमिकाओं से कलाकार ही नही जनता भी उकता जाती है। यही बात मैं जब किसी निर्माता से कहती हूं निर्माता मुझे मेरी पिछली किसी फिल्म का हवाला देकर कहते हैं कि जनता आपको उसी प्रकार के रोल में पसंद करती हैं। किंतु जब जनता से साक्षात भेंट होती है तो वह शिकायत करती है कि मैं एक ही प्रकार के रोल क्यों करती हूं ? लेकिन उस वक्त निर्माता यह बात सुनने के लिए मौजूद नही होता। मैं जो लिबास पसंद करती हूं पहनती हूं अपने आप पर किसी प्रकार का ट्रेड मार्क लगाने के हक में मैं कभी नही रही। पिछले दिनों मैं दिल्ली गई थी, उस वक्त मैं बैल बॉटम पहने हुई थी। वहां होटल में हमें एक जोड़ा मिल गया। वह बहुत देर तक मुझे घूरता रहा आखिरकार जब उनसे बर्दाश्त न हुआ तो वह पूछ ही बैठे Are you Nutan? मैंने कहा Yes तब उनमें से वह औरत बोली देखा मैं न कहती थी। फिर बोली आप इस किस्म की भूमिकाएं क्यों नही करती ? आप हमेशा एक ही लिबास में क्यों आती है ? आपका रोना धोना बहुत देख चुके अब आप इसी प्रकार के मॉडर्न रोल कीजिए। नूतन ने जनता की बात बताते हुए कहा।

इन 25 वर्षों में जो आपने इस इंडस्ट्री में गुजारे हैं, आज आप क्या परिवर्तन महसूस करती हैं ?

टैक्निकल साइड में हमने पहले काफी उन्नति की है और वह सब आपके सामने है और जो लोग मेरे सामने इस लाइन में आए थे उन्होंने भी काफी तरक्की की है जैसे वहीदा जी और माला सिन्हा नूतन ने बताया।

क्या आपने अपने समय के हिसाब से लोगों के व्यवहार में कुछ तब्दीली प्रतीत की है ? मैंने पूछा ?

हां, पिछले पांच सालों से मैं कुछ अधिक फर्क महसूस कर रही हूं। हमारे साथ के कलाकार अब भी हैं और जोर-शोर से काम कर रहे हैं।

लेकिन इन पांच सालों में जो कलाकार आए हैं उनमें वह लगन और डेडिकेशन नही पायी जाती। उनके ख्याल में लोकप्रियता की इमेज कुछ और ही है। उनमें से अधिकतर कलाकारों का यह विचार है कि जितनी अधिक फिल्में उनके पास होंगी वे उतने ही बड़े कलाकार माने जाएंगे उनकी नज़र में इस बात की कोई महत्वता नही हैं कि वे कितने बड़े निर्देशक या कलाकारों के साथ काम कर रहे हैं नूतन ने नई पीढ़ी के कलाकारों पर चोट कसते हुए कहा।

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हर कोई आत्म सम्मान और अच्छा व्यवहार चाहता है अशोक कुमार, माला जी, वहीदा जी, राज जी आदि किसी में भी आप छिछोरा पन नही पायेंगे। इसीलिए पब्लिक में उनका बड़ी अच्छी इमेज है। क्योंकि मैं ही नही मेरे पुराने साथी भी शूटिंग आदि में समय पर पहुंच जाते हैं। लेकिन आज यह नये कलाकार जानबूझ कर सेट पर लेट आते हैं। क्या आप को ऐसा कुछ अंतर फिल्मों में भी नज़र आता है ?

वक्त के साथ हर चीज बदलती रहती है। आज फिल्म मेकर भी दो प्रकार के हैं एक वह जो केवल निर्माता हैं और दूसरे वे जो स्वयं निर्माता भी हैं और निर्देशक भी। इसी प्रकार दो तरह के दर्शक भी हैं। एक वह जो अपने आपको जीनियस समझते हैं और अंकुर, रजनी गंधा जैसी साफ सुथरी फिल्में देखना पसंद करते हैं। दूसरे वह हैं जो केवल मनोरंजन के लिए फिल्म देखते हैं और ऐसे दर्शकों की संख्या ज्यादा है। इसलिए निर्माता कमर्शियल वैल्यूज को ज्यादा अहमियत देते हैं। इसी वजह से पब्लिसिटी का ढ़ंग बदल गया है। वे ऐसे कलाकारों को लेकर फिल्में बनाते हैं जिनके नाम बिकते हैं और मेरे ख्याल से इसमें कोई बुराई नही है। क्योंकि फिल्म एक बिजनेस है। पुराने जमाने में यही होता था। फर्क केवल इतना है कि आज के मेकर सेल वैल्यूज को अधिक देखते हैं और टैलेंट्स को नही देखते आज राज जी (राज कपूर) जैसे मेकर कम हैं राज जी ने जो फिल्में बनाई है वह इसलिए नही चली कि उनमें उछल कूद होती थी बल्कि वह उन फिल्मों के द्वारा कुछ न कुछ मकसद उद्देश्य और संदेश भी देते हैं नूतन ने विश्लेषण करते हुए कहा।

आपने आज के संगीत में कोई चेंज पाया या नही ? क्योंकि पहले के गीत आज भी फ्रेश लगते हैं और आज की फिल्मों के गीत जल्द ही भुला दिये जाते हैं। ऐसा क्यों है ? मैंने पूछा।

मैंने अभी आपसे कहा था कि जमाने के साथ-साथ हर चीज बदलती है, इसी तरह संगीत के सुर भी ऊंचे नीचे होते रहते हैं। आज नौजवानों के सुर बहुत ऊंचे है इसलिए संगीत भी उसी किस्म से तैयार किया जाता है। आप स्वर्गीय मदन मोहन जी की धुन को नीतू सिंह या किसी अन्य नौजवान कलाकार पर पिक्चराइज़ करिये तो वह बात नही बनेगी जो आर.डी. आदि के संगीत से बनती है। इसीलिए आज की फिल्मों में तेज़ म्यूजिक होता है। आप इस बात को इस तरह समझिये कि मेरा जो मैंटल मेकअप है उसके हिसाब से मैं जमाने के मौजूदा ट्रेंड को समझ सकती हूं लेकिन उसमें ढल नहीं सकती क्योंकि कोई भी आदमी एकदम से अपने आपको बदल नही सकता। बस ऐसा ही कुछ हिसाब पुराने संगीतकारों का है नूतन ने आज के संगीत पर प्रकाश डालते हुए कहा।

लेकिन नूतन जी आप तो पिछले 25 वर्षों से बराबर फिल्मों में जम गई हैं। आपके सामने कितने ही लोग आये भी और गये भी। क्या आप अपने फिल्मी जीवन के इस लम्बे सफर पर प्रकाश डालना पसंद करेंगी ? मैंने नूतन के बीते दिनों का इतिहास जानने के लिये पूछा।

मैंने आज जो स्थान, जो रेपुटैशन अर्जित की है उसमें मेरी योग्यता टैलेंट्स और मेरे कुशल व्यवहार का बहुत बड़ा हाथ है। मुझ में अभिनय क्षमता बचपन से थी क्योंकि मेरी रगो में एक अभिनेत्री का खून जो है। इसीलिए मुझे बचपन से ही नाच गाने का शौक था। मेरे माता पिता फिल्म से संबंधित थे। उन्होंने मुझसे अभिनय क्षमता देखकर इस लाइन को अपनाने में मदद दी और बच्चे चूंकि अपने मां बाप के पद चिन्हों पर चला करते हैं इसलिए मैंने मां बाप की मंजिल को अपना लिया हालांकि मेरे मन में ऐसी तमन्ना न थी, अलबत्ता मैंने जो कदम मां-बाप की खातिर उठाया था उसमें कोशिश थी फिर सफल हो जाऊं और मेरी मेहनत का मुझे फल भी मिला। यदि मां बाप चाहते कि मैं कोई और करियर अपनाऊं तो उसमें भी ऐसी ही मेहनत करती। नूतन ने बताया ‘हमारी बेटी’ मेरी पहली फिल्म थी जिसे मेरी मां ने प्रोड्यूस किया था। ‘हमारी बेटी’ से ‘सौदागर’ तक मेरे फिल्मी करियर में कई बार गैप पड़ा है सौदागर के वक्त मेरी पांच फिल्में सेट पर थी अगर वे समय पर बनकर रिलीज़ हो जाती तो आज मेरी भी दो तीन फिल्में थियेटर में चल रही होती नूतन ने बड़ी हसरत भरी आवाज में कहा।

आपने अपनी एक फिल्म ‘छबीली’ में गाने भी तो गाए थे अच्छी आवाज़ होने और लोगों के पसंद करने के बावजूद आपने अन्य फिल्मों में गाने क्यों नही गाये ? मैंने पूछा।

मैंने अपने निर्माताओं और निर्देशकों से आग्रह नहीं किया कि मैं अपने गाने स्वंय ही गाऊंगी उस वक्त गानों के लिए समय भी न था नूतन ने बताया।

अब पता चला है कि आप अपनी एक फिल्म में गाने भी लिख रही हैं क्या आपको पहले से शौक था ?

और वे गीत क्या उसी समय के लिखे हुए हैं ? मैंने पूछा,

शोक जरूर था लेकिन फिल्म में गीत लिखने की कल्पना तक मैंने नही की थी। फुर्सत के समय यूं ही गीत लिख लिया करती हूं और उन्हें गुन गुनाया करती हूं मैं फिल्म ‘मयूरी’ की शूटिंग कर रही थी खाली समय में मैं गीत गुनगुना रही थी कि निर्देशक बीरेन भट्टाचार्या वहां आ गए उन्होंने वह गीत सुन लिया बड़ी तारीफ की जब मैंने उन्हें बताया कि यह गीत मेरे ही लिखे हुए हैं उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ और कुछ सुनाने के लिए कहा। सुनने के बाद उन्होंने अपनी फिल्म के लिए गीत लिखने का ऑफर दिया जो मैंने स्वीकार कर लिया।

आपने शादी के बाद अपना प्रोडक्शन हाउस भी तो शुरू किया था। बहल साहब में एक सफल निर्देशक के सारे गुण थे। किंतु उसके बाद आपने प्रोडक्शन हाउस क्यों बंद कर दिया ? मैंने आश्चर्य से पूछा।

‘सूरत और सीरत’ बारह साल पहले बनी थी। वह अगर आज बनती तो ‘अंकुर’ की तरह काफी चलती दरअसल वह फिल्म अपने समय से बहुत पहले आ गई थी। कंपनी बंद करने का कारण यह था कि वह फिल्म मेरी मां के बैनर शोभना पिक्चर्स के नाम से बनाई गई थी। उसकी निर्मात्री भी मेरी मां थी। बाद में हमारा आपस में झगड़ा हो गया। इसलिए कंपनी बंद हो गई। नूतन ने बताते हुए कहा।

आपने मां-बाप की खातिर फिल्म लाइन अपनाई थी। फिर मां से झगड़ा करके क्यों अलग हो गईं ? मैंने जिज्ञासा से पूछा।

कुछ निजी कारणों से हमारा झगड़ा हो गया। उसमें कुछ बिजनेस के मामलात भी थे। दरअसल जब कोई आदमी किसी को धोखा देता है तो संबंध तो अपने आप ही टूट जाते है और चूंकि धोखा मेरी अपनी मां ने दिया था इसलिए मुझे बहुत ज्यादा बुरा लगा क्योंकि मैं सोच भी नहीं सकती थी कि कोई मां-बाप अपनी ही औलाद अपने ही खून से भी धोखेबाजी कर सकते हैं। इसीलिए दिल खट्टा हो गया नूतन ने खेद भरे स्वर में बताया।

क्या आपका आपकी बहनों से भी झगड़ा है ? क्योंकि तनुजा की शादी में हमने आपको बहुत तलाश किया था किंतु आपका कहीं अता-पता ही नही था। आप उस शादी में आई ही नहीं थी मैंने कहा।

हमारा आपस में कोई झगड़ा नही है। हम बहनें जब भी मिलती हैं तो बड़े प्रेम से मिलती हैं। मेरा अपनी बहनों से कोई झगड़ा नही हुआ। घर पर आना जाना नही है क्योंकि मैं हिप्पोक्रेसी की कायल नहीं हूं। शादी ब्याह में लोग दिखावे के लिए शरीक होते हैं। लेकिन मैं कहती हूं जो कुछ दिल में हो, वही सामने होना चाहिए दिल साफ न हो तो मिलने से कोई फायदा नही

क्या निजी और फिल्मी जीवन में आप कुछ अंतर महसूस करती हैं ? मैंने पूछा।

शादी के बाद अक्सर लोगों ने यह सवाल किया है एक आम लड़की जो दफ्तर में काम करती है। वह भी शाम को काम के बाद घर पहुंच जाती है। बस फर्क इतना है कि हम मुंह पर चूना पोत कर काम करते हैं और वह मुंह पर पाउडर लगाकर काम करती है। लेकिन उनसे कोई यह सवाल नही करता नूतन ने कहा।

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शादी के बाद आपके और संजीव के रोमांस के साथ आपके थप्पड़ के बड़े चर्चे हुए थे ? यह कहां तक सच है ? मैंने पूछा।

संजीव कुमार पब्लिसिटी हासिल करने के लिए गलत हथकंडे इस्तेमाल कर रहे थे। एक दिन उन्होंने मुझे उत्तेजित कर दिया जिसकी वजह से यह दुर्घटना हुई? एक शादी-शुदा अभिनेत्री को इस तरह बदनाम करना अच्छा नही होता। इसका उन्हें फल मिला। हालांकि वह कलाकार अच्छे हैं। नूतन ने बिना झिझक कहा।

आप अपने रोल के हिसाब से अपनी यादगार फिल्में किन्हें मानती हैं ? मैंने पूछा।

मुझे रोल्स से इतना संतोष नहीं मिलता जितना अच्छे निर्देशकों के साथ काम करने से मिलता है। इस हिसाब से बिमल राय की ‘सुजाता’ शाहित लतीफ की ‘सोने की चिड़िया’ और फिल्म की कहानी अभिनय, टैक्निक के हिसाब से ‘बंदिनी’ और ‘सूरत और सीरत’ मेरी यादगार फिल्में हैं नूतन ने कहा।

यह औरतों का वर्ष चल रहा है। इस अवसर पर आप Womenlib के बारे में क्या कहना चाहती हैं ? मैंने उठने से पूर्व आखिरी प्रश्न किया।

मैं Womenlib में नही आ सकती। दरअसल जो काम औरत कर सकती है वह औरत ही कर सकती है और मर्द का जो काम है वह मर्द ही कर सकता है। नूतन ने अपने विचार स्पष्ट करते हुए कहा।

और जब मैं नूतन के पास से उठा तो मेरे जह़न में नूतन की सादगी और कला के निखार का चमन खिला हुआ था।

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