मूवी रिव्यू: आतंकवाद का अलग चेहरा दिखाती ‘समीर’

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आंतकवाद को लेकर अभी तक ढेर सारी फिल्में आ चुकी हैं लेकिन दक्षिण बजरंग छेरा द्धारा निर्देशित फिल्म ‘समीर’ में कुछ नये तथ्य रखे गये हैं। जिसके तहत आतंकवाद का एक अलग चेहरा उभर कर सामने आता है।

समीर यानि मौहम्मद जिशान अयूब एक कॉलेज स्टूडेंन्ट है उसे गुजरात का आतंकवाद विरोधी दस्ते का चीफ सुब्रतो दत्ता अरेस्ट कर गुजरात ले आता है। कॉलेज में उसके साथ सहपाठी बनकर रहे मुख्य आतंकवादी यासीन के बारे में पूछताछ करता है। यासीन आंतकवादी है जो जगह जगह बम ब्लास्ट करवाने का दोषी है। चूंकि वो गुजरात का रहने वाला है और उसकी मां सीमा बिस्वास अहमदाबाद के एक मौहल्ले में रहती है। सुब्रतो जिशान को यासीन का दोस्त बनाकर उसकी मां के पास भेजता है क्योंकि उसे शक है कि यासीन का पता वहीं से लगेगा। यासीन जब भी कुछ करता है तो उससे पहले एक जर्नलिस्ट अंजली पाटिल को अपने किये जाने वाले कारनामे के लिये ईमेल भेजता है। सुब्रतो अंजली की भी मदद लेता है। इस प्रकार मुख्य आरोपीयों तक पहुंचने के लिये एटीएस चीफ सुब्रतो अपने मकसद में कामयाब हो पाता है।

जैसा बताया गया है कि आतंकवाद को लेकर कई फिल्में आ चुकी है। लेकिन इस बार फिल्म के तहत बताया गया है कि आतंकवाद सिर्फ बाहरी लोग ही नहीं बल्कि पॉलिटिशियन भी इसमें शामिल हैं। फिल्म ये सब बड़े प्रभावी ढंग से कहती है। हर किरदार बिलकुल रीयल लगते हैं, लेकिन फिल्म का क्लाईमेक्स बेअसर रहा क्योंकि जो बातें किरदार कह रहे हैं वो समझ से परे है। अगर क्लाईमेक्स में ये कहा गया है कि आतंकवाद के पीछे राजनेताओं का भी बहुत बड़ा हाथ है तो उसे सही तरीके से नहीं कहा गया।

मौहम्मद जीशान अयूब ने अपनी भूमिका को बहुत बढ़िया ढंग से निभाया है। लेकिन सुब्रतो दत्ता को फिल्म का सरप्राइज पैकेज कहा जा सकता है उसने एटीएस चीफ की भूमिका को बहुत ही प्रभावशाली ढंग से अजांम दिया है। अजंली पाटिल ने पत्रकार की भूमिका को बेहतर अभिव्यक्ति दी है। इसके अलावा सहयोगी कलाकारों जैसे चिन्मय मंडलेकर, सीमा बिस्वास, मनोज शाह,  आलोक गडगेकर तथा मास्टर शुभम बजरंग आदि बेहतरीन सहयोगी कलाकार साबित हुये हैं।

अंत में फिल्म के लिये कहना है कि वो जिस मकसद को लेकर चलती है उसमें वो एक हद तक कामयाब है।

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