मूवी रिव्यू: गंभीर सवाल उठाती ‘कैदी बैंड’

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हमारे देश में मुकदमे या केस तो लाखों करोड़ों में हैं लेकिन उन्हें कोर्ट में अंजाम तक पहुंचाने वाले जजों की संख्या हजारों में हैं लिहाजा अडंर ट्रायल में फंसे इनोसेंट लोग सालों साल जेलों में सड़ते रहते हैं। निर्देशक हबीब फैसल ने इसी गंभीर मुद्दे को लेकर लगभग नये कलाकारों के साथ फिल्म ‘कैदी बैंड’ में ये सवाल उठाया है।

जेल में होनहार सिंगर संजू यानि आदर जैन और बिंदू यानि आन्या सिंह फर्जी केस में फंसकर जेल में अंडर ट्रायल हैं और फैसले के इंतजार में पिछले तीन साल से जेल में बंद हैं। इसी तरह उनके साथ एक बेहद पढ़ा लिखा कवि,एक म्यूजिशियन सिख और एक अन्य विदेशी म्यूजिशियन नीग्रो, वे भी अंजाने में या मजबूरी में किये अपराध या फिर किसी के द्धारा फंसाये गये केस के तहत अंडर ट्रायल हैं। ये पांचों जेल में आजादी के दिन अपना बैंड बना कर परफॉर्म करते हैं जिसे देख सीएम उन्हें जेल में रखने का आदेश जेलर सचिन पिलगांवकर को देते हैं क्योंकि वो उनका बैंड आने वाले चुनाव में यूज करना चाहते हैं। एक दिन जेल में उनके साथ परर्फाम करने एक प्रसिद्ध बैंड आता है, वो उनसे काफी प्रभावित होता है उसका कहना है कि अगर वे आने वाले वक्त में एक म्यूजिक कॉन्टेस्ट में हिस्सा लेने से पहले जेल से बाहर आ जाते हैं तो उनका पचास लाख तक जीतने का चांस है। इसके बाद संजू और बिंदू अपने साथियों के साथ जेल से भागने का प्लान बना कर उस कॉन्टेस्ट में हिस्सा ले पचास लाख जीतने के बाद अपने लिये नामी वकील राम कपूर को हायर करना चाहते हैं। इसके अलावा वे उस कॉन्टेस्ट के द्धारा अपनी बात भी जनता तक पहुंचाना चाहते हैं कि किस प्रकार उनके जैसे सैंकड़ों लोग अंडर ट्रायल हो जेलों में सड़ रहे हैं। वे जेल से भागने में और उस कॉन्टेस्ट में हिस्सा लेने के अलावा अपनी बात मीडिया तक पहुंचाने में कामयाब हो जाते हैं। उनसे प्रभावित हो राम कपूर फ्रि ऑफ कॉस्ट उनके केस लड़ता है और उन्हें जेल से रिलीज करवाता है। इसके बाद वे अपने बैंड के तहत पैसा जमा कर अपने जैसे इनोसेंट लोगों को जेल से बाहर निकलाने को अपना उद्देश्य बना लेते हैं।

फिल्म की कहानी एक रीयल घटना से प्रेरित है। बिलकुल इसी कहानी पर फरहान अख़्तर और गिप्पी ग्रेवाल अभिनीत फिल्म ‘ लखनऊ सैंट्रल’भी रिलीज होने वाली है। खैर इस फिल्म की बात की जाये तो विषय वाकई काफी गंभीर और दहशत पैदा करने वाला है क्योंकि न जाने कितने इनोंसेट और निर्दोश लोग जेलों में अपने फैसले के इंतजार में सालों जेल में ही गुजारने के लिये मजबूर हैं। बेशक निर्देशक ने ये सवाल जिस ढंग से उठाने की कोशिश की है उसमें वो एक हद तक कामयाब है। जेल और उसके कैदी किसी फिल्मी जेल के न हो रीयलस्टिक लगते हैं। पटकथा और संवाद तथा संगीत लगभग ठीक रहे।

मुख्य भूमिकाओं में आदर जैन और आन्या सिंह हैं जिन्होंने इस फिल्म से अपना डेब्यु किया है। उनके अलावा कुछ और आर्टिस्ट भी फिल्म के तहत पहली बार नजर आये और अच्छा काम कर गये। जंहा तक आदर जैन की बात की जाये तो पहली फिल्म के मुताबिक वो ठीक ठाक काम कर गया, लेकिन आन्या सिंह में वो सारी खूबियां मौजूद हैं जो हिन्दी फिल्म की नायिका में होनी चाहिये यानि बॉलीवुड को आन्या सिंह के रूप एक और हीरोइन मिल गई। राम कपूर वकील की छोटी सी भूमिका में बढ़िया काम कर गये, एक अरसे बाद सचिन पिलगांवकर को जेलर की नगेटिव भूमिका में देख अच्छा लगा।

अंत में। कैदी बैंड जैसी सवाल उठाती फिल्म को दर्शक पसंद कर सकते हैं ।

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