सिनेमा घरों से आजाद हो गया- ‘जन गण मन…’

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‘‘जन गण मन अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता…!’’ सिनेमा घरों में मुख्य फिल्म शुरू होने से पहले राष्ट्रगान के लिए खड़े होकर गाने की परंपरा चल रही थी। भारत की सर्वोच्च न्यायालय ने अब इस प्रक्रिया को स्वैच्छिक कर दिया है। अब, आपकी मर्जी हो तो देश-सम्मान में खड़े होइए, गाइए या मत गाइए! कोई विरोध नहीं करेगा। और न्यायालय ने यह फैसला दिया है कुछ लोगों के विरोध की वजह से, जो इसमें ‘व्यक्ति की स्वतंत्रता’ के अधिकार का हनन होना मानते थे।

बेशक यह हो सकता है विवाद का विषय कि थिएटर में कई लेट आने वाले परिवार के दर्शकों को दिक्कत होती थी, लेकिन सिर्फ 52 सेकेन्ड की बात थी, जिससे कुछ समय के लिए थिएटर में बैठा दर्शक एक बार देश प्रेम की भावना से आहलादित भी होता था। हम राष्ट्रगान के शब्दों की संरचना पर नहीं जाएंगे लेकिन हम अपने दर्शकों को राष्ट्रगान का इतिहास और विरोध के लिए मुखरित होने वालों का जिक्र जरूर करना चाहेंगे। भारत का राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ सन् 1950 (14 जनवरी) को एसेम्बली ऑफ इंडिया द्वारा स्वीकृत किया गया था। इस गीत की रचना की थी नोबल पुरस्कार प्राप्त कवि-संगीतज्ञ रविन्द्रनाथ टैगोर ने। टैगोर का लिखा गीत बंगला भाषा में पांच स्टेन्जा में था जो आजादी पूर्व जॉर्ज पंचम के स्वागतार्थ लिखा हुआ था। सबसे पहले इस पूरे गीत का एक स्टेन्जा इंडियन नेशनल कांग्रेस के कलकत्ता कांफ्रेन्स में 27 दिसम्बर 1911 को गाया गया था। अगले वर्ष 1912 में टैगोर संपादित ‘तत्व बोधिनी पत्रिका’ में पूरा गीत छपा था। आजादी की पूर्ण सत्ता मिलने के साथ इस गीत को राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार किया गया। हर देश का अपना राष्ट्रगान होता है वैसे ही भारत का राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ बन गया। सब कुछ ठीक था। यूनेस्को द्वारा ‘जन गण मन’ को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रगान घोषित किया गया है। 30 नवम्बर 2016 को सुप्रीम कोर्ट ने एक आदेश के तहत कहा कि ‘जन गण मन’ को थिएटरों, सिनेमाघरों, स्कूलों में गाया जाए। विरोध तब शुरू हो गया। जब अनिवार्यता थोपी गई। सबसे पहला विरोध केरल के एक स्कूल से हुआ जो धार्मिक मुद्दा जोड़कर राष्ट्रगान का विरोध किए, फिर तो विरोध के स्वर बढ़ते गए। जम्मू कश्मीर में सिनेमाघर में दो कश्मीरी खड़े नहीं हुए तो उनकी पिटाई की गई और बवाल शुरू हो गया। आखिर, 9 जनवरी 2018 को सर्वोच्च न्यायालय ने ‘जन गण मन’ को स्वैच्छिक कहकर सरकार को सोचने-विचारने के लिए मुद्दा दे दिया। बहरहाल अब, ‘जन गण मन’ सिनेमा घरों से आजाद हो गया है! आप में देशभक्ति की भावना है तो दिल की आवाज सुनिए!!

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