मूवी रिव्यू: बच्चों की पंसद पर खरी नही उतर पाती ‘स्निफ’

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बाल फिल्मों के स्पेशलिस्ट लेखक निर्देशक अमोल गुप्ते ने इस बार फिल्म ‘स्निफ’ में एक ऐसे बच्चे को पेश किया है जिसकी सूंघने की शक्ति चमत्कारी है। लेकिन हीरो अपनी अनोखी शक्ति कक बावजूद कोई रोमांच पैदा नहीं कर पाता।

एक पंजाबी सिख परिवार का बच्चा खुशमीत गिल अजीब तरह से बीमार है। वो स्कूल जाता है खेलता है, खाता पीता है, लेकिन उसमें सूंघने की शक्ति नहीं है लिहाजा वो किसी भी चीज को सूंघ नहीं सकता। इस बात को लेकर उसके पिता और दादी सुरेखा सीकरी बहुत परेशान हैं। अचानक एक दिन खुशमीत को किसी ईश्वरीय ताकत ने सूंघने की इतनी शक्ति दे दी कि इसके बाद वो दो किलोमीटर आगे तक की कोई भी चीज सूंघ सकता था। अपनी इस अनोखी शक्ति के तहत वो एक टीचर का पर्स तलाश कर देता है। इसके अलावा अपनी सोसाईटी में  पुलिस की हेल्प करते हुये कार चोर को ढूंढ निकालता है। इस तरह वो अपने स्कूल और सोसाईटी का हीरो बन जाता है।

बेशक अमोल गुप्ते अभी तक अपनी बाल फिल्मों में बच्चों को लेकर कई तर्क पूर्ण और संदेशात्मक फिल्में बना चुके हैं लेकिन ‘स्निफ’ में वे ऐसा कोई कमाल नहीं कर पाते जिसके लिये उन्हें हर बार की तरह शाबासी दी जा सके। फिल्म एक बच्चे की अलग तरह की बीमारी लेकर है जिसमें बच्चा सूंघने की शक्ति से वंचित है लेकिन उसकी बीमारी जो बाद में चमत्कारी ढंग से न सिर्फ ठीक हो जाती है बल्कि उसमें आम इंसानों से ज्यादा सूघंने की शक्ति आ जाती है। कहने को फिल्म का जॉनर एडवेंचर और ड्रामा है लेकिन बयासी मिनिट की इस फिल्म में शुरू से अंत तक न तो एडवेंचर है और न ही ड्रामा।

मुख्य किरदार खुशमीत गिल काफी इनांसेंट और मासूम है। उसने बड़ी सहजता से अपनी भूमिका को निभाया है। बाकी सुरेखा सीकरी और सहयोगी कलाकार जिनमें अमाले गुप्ते भी षामिल हैं ने खुशमीत को अच्छा सहयोग दिया है।

अगर फिल्म की बात की जाये तो इस बार ये फिल्म बच्चों की पंसद पर खरी साबित होगी, इसमें शक है।

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