फिल्म ‘बाजार’ सवाल उठाती है कि महत्वाकांक्षा पूर्ति के लिए आप कितनी लाइनें क्रॉस करेंगे- गौरव के चावला 

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हर इंसान के अपने कुछ सपने और कुछ महत्वाकांक्षाएं होती हैं. पर सवाल है कि अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा करने या किसी मुकाम को पाने के लिए किस हद तक जाना चाहेंगे? इसी सवाल के इर्द गिर्द शेयर बाजार व टेलीकॉम घोटाले की पृष्ठभूमि घोटाला में निर्देशक गौरव के चावला फिल्म ‘बाजार’ लेकर आ रहे हैं।

 सबसे पहले‘मायापुरी’ के पाठको को अपनी पृष्ठभूमि के बारे में बताएं?

– मुंबई में जन्मा, मगर राजस्थान में अजमेर के बोर्डिंग स्कूल से मेरी स्कूली पढ़ाई हुई. उसके बाद मुंबई में पढ़ाई की. मेरे पिता किशोर चावला ने फिल्म ‘आँसू बने अंगारे’ जैसी फिल्म का निर्माण किया है. कई टीवी सीरियल बनाए. मेरी मम्मी रेखा चावला की विज्ञापन एजेंसी थी. उन्हांने ‘रामायण’ व ‘श्रीकृष्ण’ के लिए मार्केंटंग की थी. एक तरह से कॉलेज की पढ़ाई के साथ ही इस दुनिया को देखते हुए ही बड़ा हुआ हूं.इसके अलावा मुझे लिखने का भी शौक रहा है.पढ़ने का भी शौक रहा. पढ़ते पढ़ते लिखना शुरू कर दिया।

फिल्म की विषयवस्तु का स्रोत ?

  यह कहानी निखिल आडवाणी के दिमाग की उपज है, जो कि इस फिल्म के निर्माता भी हैं.पहले इस फिल्म को निखिल आडवाणी ही निर्देशित करने वाले थे. इसकी पटकथा निखिल आडवाणी, परवेज शेख और असीम अरोड़ा ने मिलकर लिखी है।

बतौर निर्देशक आपको यह फिल्म कैसे मिली?

– एक दिन रात में निखिल का फोन आया कि मुझे कल सुबह सैफ अली खान से मिलना है. मैंने कहा कि किस लिए? तो उन्होने कहा कि फिल्म ‘बाजार’ को लेकर.मैंने कहा कि पर यह तो आप बना रहे हैं.तो निखिल ने कहा कि नहीं, अब तुम्हें ‘बाजार’ निर्देशित करनी है. दूसरे दिन सैफ अली से मिला. लंबी बातचीत हुई. स्पष्ट कर दूं कि इस फिल्म में सैफ अली पहले जुड़ चुके थे. बतौर निर्देशक मैं उनके बाद जुड़ा.देखिए, हर इंसान की तकदीर होती है.मैं किसी अन्य विषय पर काम कर रहा था, पर उसे छोड़कर ‘बाजार’ निर्देशित की।

 तो पटकथा वही है या आपने कुछ बदलाव किए?

– मैंने अपनी संजीदगी के अनुरूप उस पटकथा में कुछ बदलाव किए. पहले यह फिल्म काफी परिपक्व उम्र के लोगों को ध्यान में रखकर लिखी गयी थी. मेरे हाथ में इसे सौंपते हुए निखिल ने कहा कि इसे युवा पीढ़ी को ध्यान में रखकर बनाओ. मैंने सोचा कि जब इंसान षेयर बाजार में काम करेगा या दस हजार रूपए के सौदे करेगा, तो वह ऑफिस में बैठकर नहीं करेगा. इस तरह के सौदों की बातें तो हवाई जहाज या ट्रेन में चलती रहती हैं. जो बहुत बड़े सरकारी टेंडर खरीदते है, वह दिन में स्टॉक नहीं खरीदते हैं. वह तो यह तय करते हैं कि कल सुबह इंवेस्टर कौन सा स्टॉक खरीदेगा? उसी के अनुसार वह व्यूह रचना करते हैं. तो इसी को मैने ध्यान में रखा. इसके अलावा इसमें दस हजार करोड़ का टेलीकॉम घोटाला है. हर इंसान पैसा कमाना चाहता है. पैसे को लेकर उत्सुकता रहती है. हमारी फिल्म में सवाल है कि आखिर पैसा कमाने के लिए आप किस हद तक जाएंगे? पहले फिल्म में राधिका आप्टे का किरदार नहीं था, तो उसे जोड़ा.राधिका आप्टे ने प्रिया मल्होत्रा का किरदार निभाया है।

फिल्म ‘बाजार’ की कहानी पर रोशनी डालेंगे?

– कहानी के केंद्र में चार मुख्य पात्र हैं. शकुन कोठारी (सैफ अली खान)व उनकी पत्नी मंदिरा कोठारी (चित्रांगदा सिंह) तथा रिजवान अहमद (रोहण मेहरा) और उनकी प्रेमिका व सहकर्मी प्रिया मल्होत्रा (राधिका आप्टे). सूरत में आंगड़िया के यहॉं नौकरी से शुरूआत कर शकुन कोठारी मुंबई में डायमंड मार्केट के राजा हैं.पचास करोड़ की कपनी को उन्होने पांच हजार करोड़ में बदल दिया. अब वह 10 हजार करोड़ के उपर का गेम खेल रहे हैं.वह ऐसे उद्योगपति हैं, जो पैसे के लिए कुछ भी करेगें. पर उन्हें अपनी बेटियों के भविष्य का डर जरूर सताता है.शकुन कोठारी जिस उद्योगपति के यहां नौकरी करते थे, उसी की बेटी मंदिरा से शादी की है. शकुन कोठारी व मंदिरा समाज की नजर में पति पत्नी है, मगर इनके बीच काफी कड़वाहट है।

 उधर इलाहाबाद में एक छोटी सी दुकान में काम करने वाले रिजवान अहमद का सपना मुंबई में बहुत बड़ा आदमी बनना है. उसकी तमन्ना शकुन कोठारी के साथ काम करने और शकुन की तरह मैगजीन के कवर पर अपनी फोटो छपे देखना. रिजवान सिर्फ सपने नहीं देखता, बल्कि अति महत्वाकांक्षी युवक है.मुंबई में प्रिया मल्होत्रा व रिजवान एक ही जगह काम करते है और फिर दोनों के बीच रोमांस भी हैं. इनके रोमांस के साथ साथ इनकी अपनी एक यात्रा है. पर यह जोड़ी बहुत परफैक्ट है. मनीष चौधरी ने स्टॉक बाजार में होने वाली गड़बड़ी की जांच करने वाली संस्था सेबी के इंस्पेक्टर की भूमिका निभायी है।

फिल्म की शूटिंग कहां कहां की?

– हमने इसे मुंबई में कई जगहां पर वह भी वास्तविक लोकेशनों पर 59 दिनों में फिल्माया है. इसे डोम रेस्टारेंट, ग्रांट रोड की गलियों के अलावा स्टॉक बाजार की बड़ी बिल्डिंग और कमोडिटी बाजार की छोटी बिल्डिंग में भी फिल्माया।

कलाकारों का चयन किस तरह से किया?

– शकुन कोठारी के किरदार में मेरे आने से पहले ही सैफ अली जुड़ चुके थे. रोहन मेहरा हमारे साथ ‘एम्मैय इंटरटनमेट’ में तीन वर्ष से है. हम इसे तैयार कर रहे थे और सोच रहे थे कि इसे किस तरह से बॉलीवुड में लॉच किया जाए. फिर हमने ‘बाजार’ के लिए उसका ऑडीशन लिया. ऑडीशन के लिए वह खुद दाढ़ी वगैरह लगाकर आया, तो हमारी फिल्म के रिजवान में फिट हो गया।

  जब हमने लगभग डेढ़ वर्ष पहले राधिका आप्टे को अपनी फिल्म के साथ जोड़ा था, उस वक्त राधिका आप्टे की कोई पहचान नहीं थी. तब लोगों ने षंका व्यक्त करते हुए राधिका को फिल्म से जोड़ने पर सवाल उठाया था. पर अब राधिका भी स्टार बन गयी हैं. मंदिरा के किरदार के लिए चित्रागंदा सिंह ही मेरी पहली पसंद थी.मंदिरा के किरदार में काफी गहरायी है.वह एक खानदानी रईस की बेटी है. फिल्म ‘बाजार’ में सभी महिला पात्र काफी अहम हैं।

आप फिल्म ‘बाजार’ के माध्यम से क्या कहना चाहते हैं?

– एक आदर्शवादी सोच है कि आपको बहुत सारा पैसा चाहिए.सबको बड़ा आदमी बनना है. पर सबके सामने एक च्वॉइस होती है कि आप गलत करोगे या सही.आप जो कुछ चुनते हैं, वह सही या गलत की तरफ जाता है.फिल्म में रिजवान के पिता एक सही बंदे हैं. जो पिछले 25 वर्षो से एक ही जगह काम कर रहे हैं. पर रिजवान को तो दो माह में ही बड़ा आदमी बनना है. इस महत्वाकांक्षा के चलते रिजवान यह भूल गया कि बड़ा बनने की, उसे क्या कीमत चुकानी पडे़गी।

मेरी फिल्म यह कहती है कि आप अपने सपने को पूरा करने के लिए किस हद तक जाएंगे? इसी के साथ यह फिल्म लोगों को समझाएगी कि इंसान के सपने और महत्वाकांक्षा में बड़ा अंतर होता है. महत्वाकांक्षा में लालच आ जाता है.जबकि सपना लालच नही होता. अब सवाल है कि महत्वाकांक्षा पूरा करने के लिए आप कितनी लाइनें क्रॉस करेंगे?

हमने इस फिल्म में खानदानी रईस और जो नए नए अमीर बने हैं, उनकी सोच, उनके व्यक्तित्व और पैसे के प्रति उनके रूझान को भी चित्रित किया है। खानदानी रईस के अंदर एक संतुष्टि नजर आती है, यह मंदिरा के पिता में है. पर जो नए नए अमीर बने हैं यानी कि शकुन कोठारी, उन्हें हमेशा छिन जाने का डर रहता है. इसी तरह के डर का शिकार है शकुन. शकुन के पास दस हजार करोड़ से ज्यादा है. पर वह कब उसके पास से चला जाएगा, यह डर उसे सताता रहता है. हमने इस बात को भी रेखांकित किया है कि जो लोग बहुत बडे़ घोटालों मे फंसते हैं, मसलन आप नीरव मोदी को ले लें, ऐसे लोग जेल कभी नहीं जाते. हां! यदि बहुत ज्यादा कानून ने अपना काम दिखाया, तो एक दो माह के अंदर जेल से बाहर आ जाते हैं. ऐसी दुनिया की कहानी में इमोशन का धक्का कैसे लगेगा? ऐसे में इमोशन का धक्का लगाने के लिए पारिवारिक इमोशन का उपयोग किया है. इसीलिए फिल्म में शकुन कोठारी की दो बेटियां हैं।

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