क्या आप जानते हैं बॉलीवुड में भी है आरक्षण ?

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आज जब पूरा देश आंदोलन की चपेट में है, दलित-मुद्दे पर संविधान से सर्वोच्च न्यायालय तक के लोग आरक्षण की चर्चा में लिप्त हैं, एक फिल्मी-दफ्तर में भी कोई सज्जन अपना ज्ञान बघार रहे थे- ‘भई, हमारा बॉलीवुड ही ऐसा है जहां कोई ‘आरक्षण’ नहीं! ना यहां कोई जाति-पाति है ना ऊंच- नीच! मुसलमान-हिन्दू से और हिन्दू-मुसलमान से रिश्ता बनाते हैं। पति पंजाबी है तो बीबी मद्रासी है और बेटे बंगाली लड़की से लव अफेयर चलाते हैं। स्पॉट ब्वॉय प्रोड्यूसर बनता है तो प्रोड्यूसर गांव के गरीब लड़के पर करोड़ों खर्च करके फिल्म बनाता है। और है भी! तभी तो सुनने वालों में से एक ने तपाक से कहा- ‘नजर ना लगे हमारी इंडस्ट्री को…! टचवुड!!’

मगर गहराई से सोचिए तो वैसा कुछ नहीं है जैसा दिखता है। बॉलीवुड का कोई संविधान नहीं है, क्योंकि यहां का संविधान बनाते हैं स्टार। और, स्टार हैं कौन? एक गोविन्दा और एक अक्षय कुमार को उदाहरण में मत लो। ढेरों स्ट्रगलरों को देखिये उनमें से कितने स्टार बनते हैं? वहीं बनते हैं जो स्टार संस हैं, परिवार से हैं या पैसे से स्टारडम में एंट्री पाते हैं। संजय दत्त, सनी देओल, अनिल कपूर पिछली पीढ़ी के स्टार हैं जो पारिवारिक-आरक्षण के बल पर ही आज तक टिके हैं। इसी आरक्षण की नई ऊपज है आज के स्टार – वरूण धवन, आलिया भट्ट से लेकर जाहनवी-श्रीदेवी कपूर या सारा सैफ अली खान तक। करण जौहर बॉलीवुड की भाषा में आरक्षण के नये बाबा साहब अंबेडकर हैं जो भावी पीढ़ी का संविधान रच रहे हैं, ये किनको ब्रेक देते हैं? सनी देओल पंजाब से आये सैकड़ों स्ट्रगलर लड़कों का ऑडिशन करने के बजाय अपने ही बेटे करण को क्यों हीरो बनाते हैं। निर्देशक जो स्थापित हैं या निर्माता जो हैवी बजट फिल्में बनाते हैं, वे ही कहां आरक्षित श्रेणी से बाहर चुनाव करते हैं? अब्बास मुस्तान हों, अनिल शर्मा हो या बासु भगनानी हों- सबकी कहानी में ‘आरक्षण’ है। प्रकाश झा ने ‘आरक्षण’ बनाई थी, घर बैठ गये। इस इंडस्ट्री में आने के साथ ही आरक्षण शुरू हो जाता है। पूछा जाता है- किसी फिल्मी एसोसिएशन का कार्ड है?’ जूनियर आर्टिस्ट बनकर ताली बजाने के लिए कार्ड चाहिए। कुछ कैम्प, जो बड़े स्टारों के होम-प्रोडक्शन कहे जाते हैं, यहां एक जाति-विशेष के लोग ही नौकरी पाते हैं, यही हालात टीवी चैनलों के हैं। मुख्य भूमिका के लिए चैनल के आकाओं की चलती है। तात्पर्य यह कि बॉलीवुड भी आरक्षण के मुद्दे पर दूध का धुला नहीं है। सो, गलतफहमियां निकाल दीजिये!

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